Saturday, 1 February 2020

छत्तीसगढ़ राज्य का प्राचीन कालीन इतिहास या दक्षिण कोसल का इतिहास

छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास परिचय :- छत्तीसगढ़ का इतिहास अर्थात दक्षिण कोसल का इतिहास बहुत ही प्राचीन है। इसके प्रागौतिहासिक काल को पहले पंडित लोचन प्रसाद पांडेय ने "मानव जाती की सभ्यता का जन्म स्थान माना है " इसका प्रमाण प्राचीनतम आदिवासी क्षेत्र जो की रायगढ़ जिले की सिंघनपुर,कबरापहाड,खैरपुर,कर्मगढ़ आदि है, यहाँ के गुफाओ एवं शैल चित्रों के रूप में अपना प्राचीनतम स्मृति का ज्ञान कराती है। यहाँ की गुफाओ में उकेरे गए शैल चिंत्रो की खोज सबसे पहले खोज इंजिनियर अमरनाथ दत्त ने 1910 ई. में किया था। सिंघनपुरी की गुफाओ में लालरंग से पशुओ और सरीसृपों चिन्हो का रूपांकन है, जिसमे मनुष्य के चिंत्रों को रेेेखा के द्वारा खिंच कर बनाया गया है जो की अद्भुत कारीगरी है !

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छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास 


    छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास परिचय 

    प्राचीन छत्तीसगढ़ का इतिहास एक दीर्घकालीन वैभवपूर्ण इतिहास रहा है ,राज्य से मानव सभ्यता के प्रारंभिक चरण पाषाण काल से लेकर छेत्रिय राजवंशों का साक्ष्य प्राप्त हुये है, छत्तीसगढ़ के इतिहास को जानने के स्रोत - प्रशस्ति,शिलालेख,ताम्र पत्र लेख ,स्तम्भ लेख आदि के आधार पर छत्तीसगढ़ का इतिहास लिखा गया है। 

    एक चित्र में व्यक्तियों के समूह को हाथ में लाठिया और मुकदर लिए हुए एक बड़ा पशु का पीछा करते दिखया गया। पर्सीब्राउन अनुसार "चित्र अत्यंत प्राचीन काल के है और इनमे कुछ चित्र लिपियाँ अंकित है " हेडन यहाँ प्राप्त कतिपय अपखंडित अकीक शल्कों को आरम्भिक पाषाण युग के पुरापाषाण युगीन औजार कहा है इसके अतिरिक्त एडरसन द्वारा खोजा गया हेमेटाइट पेसल (मुशल )की तुलना मोहनजोदड़ो से प्राप्त बेलनाकार हेमेटाइट से की जाती है

    सिंघपुर के चित्र शैली की स्पेन की कतिपय गुफाचित्रों से विलक्षण मेल खाती है। परतु उसमे ईऑस्ट्रेलिया चित्रों से भी सादृश्य दिखाई पड़ती है।बेलपहाड़ स्टेशन (सम्बलपुर उड़ीसा ) यहाँ पार विक्रम खोल नमक पहाड़ी पर खुदे हुए शिलालेख का पंडित लोचन प्रसाद पण्डे ने सबसे पहले पता लगाया था जिसे पुरतात्विक विद्वान् श्री काशीप्रसाद जायसवाल ने इसका समय ईसा पूर्व. 4000 से 7000 वर्ष ठहराया . उसके अनुशार उसकी लिपि मोहनजोदड़ो की लिपि और ब्राम्ही लिपि के बिच की लिपि मानी गयी है विद्वानों के अनुसार ब्राम्ही लिपि फोनिशियन और यूरोपियन की जननी है इससे महाकोशल की प्रागैतिहासिक सभ्यता पर प्रकाश पड़ता है।

    रायगढ़ सिंघनपुर के चित्रित गह्वरों की खोज करते समय रायबहादुर श्री मनोरंजन घोस को 5 पूर्वपाषाण काल की कुल्हाड़ी प्राप्त हुआ।चितवाडोंगरी राजनांदगाव में बघेल और रमेन्द्रनाथ मिस्र को भूरे रंग से चित्रांकित नए शैलचित्र की खोज किया गया जिसमे मानव आकृति और पशु एवं अन्य रेखांकन है।

    छत्तीसगढ़ के महापाषाण युग के स्मारक दुर्ग ,रायपुर , सिवनी , रीवा ,जिले में पाए गए है। दुर्ग जिले में स्थित धनोरा में एक स्थान पर 500 महापाषाणिक स्मारक मिले है। जिन्हे 4 वर्गों में विभाजन कियागया है। 1956 -57 में यहाँ प्रथम वर्ग के तीन तथा दूसरे वर्ग के एक स्मारक की उत्खनन किया गया।

    ताम्रयुगीन सभ्यता के अवशेष छत्तीसगढ़ में प्राप्त हुए है। दुर्ग जिले के धनोरा गावं में ताम्रयुगीन अवशेष प्राप्त हुए है दुर्ग जिले केहि सोरर ,चिरहरि और कबराहाट में भी ताम्रयुगीन निर्मित आवास का पता चला है धमतरी से बालोद मार्ग के कईगांवों में ताम्रयुगीन शव स्थान मिले है।

    डॉ. मोरेश्वर गंगाधर दीक्षित ने इन स्थानों का सर्वेक्षण एवं उत्खनन कार्यप्रारम्भ का प्रयास किया था।

    पूर्वपाषाण एवं उत्तर पाषाण काल के अवशेष छत्तीसगढ़ की सीमा के आसपास के क्षेत्रों में मिले है। नर्मदाघाटी , बैनगंगा घाटी में अवशेष मिले है। रायगढ़ जिले के सिंघनपुर में पांच कुल्हाड़ी मिले है।

    उत्तरपाषाण काल के कराघातक हथौड़ा प्राप्त हुआ जो की उत्तरपाषाण काल का महत्वपूर्ण औजार मानाजाता है जो की नांद गॉंव के अर्जुनी के पास बोन टीला से प्राप्त हुआ है।

    वृहत्पाषाण काल दुर्ग में शव स्थान मिले है पुरतात्विक विभाग और इतिहास विभाग रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय द्वारा प्रो. काम्बले के सर्वेक्षण दाल को तीर फलक प्राप्त हुआ जो की महंत घासीदास संग्रहालय रायपुर में रखा गया है।



    हम छत्तीसगढ़ के इतिहास को तीन भागों मै बाँट कर अध्यन करते है :-

    1- प्राचीनकालीन छत्तीसगढ़ का इतिहास
    2- मध्यकालीन छत्तीसगढ़ का इतिहास
    3- आधुनिक कालीन छत्तीसगढ़ का इतिहास

    1.प्राचीन छत्तीसगढ़ का इतिहास

    1. प्रागैतिहासिक काल 

    इसे पाषाण काल के नाम से भी जाना जाता है।इस काल मै पुरातत्विक वस्तुओ के आधार पर इतिहास लिखा गया है। जैसे चित्रकारी,किसी वस्तु का प्रतिरूप,खुदाई के आधार पर मिले साक्ष आदि आधार पर इतिहास को नया मोड़ मिलता है।

    इस काल को हम अध्ययन की दृष्टि से चार भागों मै बांटा गया है-

    1) पुरा पाषाण काल   - इस काल के साक्ष्य रायगढ़ के सिंघनपुर गुफा तथा महानदी घाटी से मिलता है ।
    2) मध्य पाषाण काल  - रायगढ़ के काबरा पहाड़ में लाल रंग की छिपकिली,कुल्हाड़ी,घड़ियाल आदि के चित्र प्राप्त हुआ।
    3) उत्तर पाषाण काल - रायगढ़ के महानदी घाटी तथा सिंघनपुर की गुफा और बिलासपुर के धनपुर क्षेत्र।
    4) नव पाषाण काल   - राजनांदगांव के  चितवाडोंगरी एवं बोनटीला ,रायगढ़ के टेरम और दुर्ग के अर्जुनी। इस काल में लोग अस्थाई कृषि करना प्रारम्भ कर लिये थे ।


    महत्वपूर्ण तथ्य -

    अ. सर्वाधिक शैल चित्रों की प्राप्ति  - रायगढ़ 
    ब. सर्वाधिक महापाषाणकलिन स्रमारक - बालोद 
    द. सर्वाधिक महापाषाणकलिन अवशेषों का सबसे बडा केंद्र - भुजगहन

    2. आधऐतिहासिक काल 

    इस काल के अंतर्गत सिन्धु घाटी सभ्यता को स्थान है हमारे प्रदेश में इस सभ्यता का कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ है 

    3. ऐतिहासिक काल 

    इस काल में आर्य द्वारा वेदों का निर्माण किया गया , और लिखित साक्ष्य के साथ वैदिक सभ्यता का शुरुवात हुआ , जो इस प्रकार है -     

    वैदिक काल

    वैदिक काल ( 1500-600 ई.पू ) छत्तीसगढ़ मै इस काल का कोई साक्ष्य नही मिलता। वैदिक काल को दो भागों मै बांटा गया है -
    1) ऋग्वैदिक काल (1500-1000 ई.पु.)- कोई साक्ष्य नही मिलता।
    2) उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई.पु.)- मान्यता है कि आर्यो का प्रवेश छत्तीसगढ़ मैं हुआ। नर्मदा नदी को रेवा नदी कहने का उल्लेख मिलता है।

    महाकाव्य काल 

    1. रामायण काल 


    रामायण काल मै छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल का भाग था। इसकी राजधानी कुशस्थली थी।
    1. भानुमंत की पुत्री कौशल्या का विवाह राजा दशरथ से हुआ।
    2. रामायण के अनुसार राम अपना अधिकांश समय सरगुजा के  रामगढ की पहाड़ी, सीताबेंगरा की                      गुफा तथा लक्षमनबेंगरा की गुफा की में ब्यतीत किये।
    3. खरौद मै खरदूषण का साम्राज्य था।
    4.  बारनवापारा (बलौदाबाजार) मै 'तुरतुरिया' बाल्मीकि आश्रम जहां लव - कुश का जन्म हुआ था।
    5.सिहावा में श्रींगी ऋषि का आश्रम था। लव- कुश का जन्म स्थल मना जाता है।
    6. शिवरीनारायण में साबरी जी ने श्रीराम जी को झूठे बेर खिलाये थे ।
    7.  पंचवटी (कांकेर) से सीता माता का अपहरण होने की मान्यता है ।
     रामजी के पस्चात कोशल राज्य दो भागों मै बटा -

    1) उत्तर कोशल - कुश का साम्राज्य
    2) दक्षिण कोशल - वर्तमान छत्तीसगढ़

    2. महाभारत काल 

    महाभारत महाकाव्य के अनुसार छत्तीसगढ़ का प्राककोशल भाग था।अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा सिरपुर की राजकुमारी थी और अर्जुन पुत्र बभ्रुवाहन की राजधानी सिरपुर था।
    1. मान्यता है कि महाभारत युद्ध में मोरध्वज और ताम्रध्वज ने भाग लिए थे।
    2. इसी काल में ऋषभ तीर्थ गुंजी जांजगीर-चाँपा आया था।
    ● इस काल की अन्य बातें:-
    1. सिरपुर -चित्रांगतपुर के नाम से जाना जाता है।
    2. रतनपुर को मणिपुर (ताम्रध्वज की राजधानी) 
    3. खल्लारी को खल्वाटिका कहा जाता है , मान्यता है कि महाभारत का लाक्षागृह कांड यही हुआ था।भीम के पद चिन्ह (भीम खोह) का प्रमाण यही मिलता है ।

    3. महाजनपद काल 

    1. राजधानी- श्रावस्ती
    2. इस काल में छत्तीसगढ़ चेदि महाजनपद के अंतर्गत आता था तथा छत्तीसगढ़ को चेदिसगढ़ कहा जाता था।
    3.बौद्ध ग्रन्थ अवदानशतक मै ह्वेनसांग की यात्रा का वर्णन मिलता है।

    4. मौर्य काल 

    मौर्य काल (322 ई पू )
    1. छत्तीसगढ़ कलिंग देश (उड़ीसा) का भाग था।जोगीमारा की गुफा से "सुत्तनुका और देवदत्त " की प्रेम गाथा का वर्णन मिलता है।
    2. जांजगीर चाँपा--अकलतरा और ठठारी से मौर्य कालीन सिक्के मिले।
    3. अशोक ने सिरपुर में बौद्ध स्तुप का निर्माण करवाया था।
    4. देवगढ़ की पहाड़ी मै स्थित सीताबेंगरा की गुफा को प्राचीनतम नाट्यशाला माना जाता है।

    5. सातवाहन काल 

    1. सातवाहन शासक ब्राम्हण जाती के थे।चंद्रपुर के बार गांव से सातवाहन काल के शासक अपिलक का शिक्का प्राप्त हुआ।
    2. जांजगीर चाँपा के किरारी गांव के तालाब में काष्ठ स्तम्भ शिलालेख प्राप्त हुआ।
    3. इस काल के मुद्रा बालपुर(जांजगीर चांपा),मल्हार और चकरबेड़ा (बिलासपुर) से प्राप्त होते है।
    इस काल के समकालिक शासक खारवेल उड़ीसा का शासक था।

    नोट:- प्रथम सदी में नागार्जुन छत्तीसगढ़ आया था।

    6. वाकाटक वंश

    राजधानी - नंदिवर्धन (नागपुर )

    प्रसिद्ध शासक :- 
    1 महेंद्रसेन --समुद्रगुप्त के दुवारा पराजित ।
    2.रुद्रसेन-- गुप्त नरेश चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह इससे किया था ।                             
    3.प्रवरसेन--चंद्रगुप्त के द्वतीय का भाठ कवी कालिदास था 
    4.नरेंद्रसेन --नालवंशी शासक भावदत्त को हराया।
    5.पृथ्वीसेन-- पुष्कारी को बर्बाद किया। इसे '' खोय हुये भाग्य को बनाने वाला '' कहा गया है । 
    6.हरिसेन--  इसके मंत्री वराह देव ने अजन्ता गुफा खुदवाई थी । इसे वाकाटको ने सर्वाधिक सुयोग्य व् शक्तिशाली शासक माना है ।                                      

    7. कुषाण काल 

    1.कनिष्क के सिक्के खरसिया (रायगढ़) से प्राप्त हुआ।
    2.इस काल में तांबे के सिक्के बिलासपुर से प्राप्त हुए।
    3.इस काल में सोने के सिक्के तेलिकोट (रायगढ़)  से प्राप्त हुए ।

    8. मेघवंश 

    1. मेघवंश के सिक्के मल्हार से प्राप्त हुआ है ।

    9. गुप्त काल

    1. गुप्त काल समयावधि-(319-550 ई .)
    2. इस काल में बस्तर को महाकान्तर कहा जाता था।
    3. छत्तीसगढ़ को दक्षिणा पथ कहा जाता था।

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